पहला पड़ाव उपन्यास में सामाजिक चेतना
शोधशब्द:
पूँजीपति भ्रष्टाचार जमींदार शिक्षा-व्यवस्था,गोषवारा
उपन्यास का सम्बन्ध समाज से है। समाज परिवर्तनशील होता है, इसलिए उपन्यास के स्वरूप में परिवर्तन होना स्वाभाविक है। परिवर्तन की प्रक्रिया व्यक्ति के स्तर पर भी संभव है। श्रीलाल शुक्ल के प्रत्येक उपन्यास इसके अन्यतम उदहारण हैं। ‘पहला पड़ाव’ उपन्यास भी इस प्रक्रिया का एक पड़ाव है। यह उपन्यास हमें हमारे समय और समाज के नग्न रूप से परिचित कराता है। शोषण और भ्रष्टाचार जैसे अवगुण मानव के अंग जैसी प्रतीति देते हैं। उपन्यास एक ऐसे पात्र से परिचित करता है जो शिक्षित है पर बेरोजगार है। इस व्यवस्था ने उसे एक अदना सा मुंशी बनाकर रख छोड़ा है। सत्ते(सत्यप्रकाश) एक प्रेरणादायी व्यक्तित्व के रूप में देखा जाना चाहिए था लेकिन वह प्रेरणाहीनता का सबब बना दिया गया है। यह उपन्यास सत्ते के माध्यम से आजाद भारत के सामाजिक, सांस्कृतिक, राजनैतिक, आर्थिक और शैक्षिक पक्ष की खामियों को मजबूती से उजागर करता है। फलस्वरूप पाठक समाज के विभिन्न पक्षों को परखते हुए अपनी चेतना विकसित कर सकें। यह उपन्यास हमें ऐसी सहूलियत देता है।