दलितों का संघर्ष और जयप्रकाश कर्दम की कविताएं
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दलित साहित्य, स्वानुभूति और सहानुभूति, लोकतंत्र, शोषण,सार
भारतीय समाज में दलितों की पीड़ा को पहचानने और उसे व्यक्त करने में मुख्यधरा के साहित्य का नजरिया गौणतमूलक रहा है। दलितों की पीड़ा को खुद दलितों ने जब व्यक्त किया तो वह दलित साहित्य कहलाया। हिंदी दलित कविता में जयप्रकाश कर्दम एक पुराना और संघर्षशील नाम है। नौवे दशक में कर्दम साहब ‘छप्पर’ उपन्यास के माध्यम से दलित साहित्य में अपनी रचनात्मक उपस्थिति दर्ज करवाते हैं तथा तब से लेकर अब तक उनका निरंतर दलित लेखन जारी है। क्या लोकतंत्र में दलितों की जीवन स्थिति और संघर्ष अथवा उसकी पहचान में को बदलाव आया है या नहीं? क्या लोकतंत्र दलितों के अधिकार दिलाने में सक्षम है या नहीं? इन्ही सवालों कि तफ्तीश इस लेख में जयप्रकाश कर्दम की कविताओं के माध्यम से कि गयी है।
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प्रकाशित
2026-09-25
अंक
खंड
Articles
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दलितों का संघर्ष और जयप्रकाश कर्दम की कविताएं. (2026). वाग्धारा : बहुभाषिक पूर्व समीक्षित शोध पत्रिका, 1(1), 22-28. https://vagdhara.in/index.php/vagdhara/article/view/5