असमीया लोकपर्व विवाह गीतों में नारी का स्थान : एक विहंगम दृष्टि
Keywords:
असमीया लोक पर्व, असमीया बिया नाम, असमीया विवाह में नारी की भूमिकाAbstract
असमीया जनजीवन में सांस्कृतिक परम्पराएँ और लोकपर्व की एक विशेष महत्त्व रही है। इन लोक पर्व में गीत और संगीत का विशेष स्थान होता है और इन गीतों में नारी की भूमिका अत्यंत प्रमुख और सशक्त होती है। विशेष रूप से विवाह के अवसर पर गाए जानेवाले लोक गीत असमीया समाज की सांस्कृतिक पहचान का प्रतीक है। इन गीतों में न केवल नारी की भूमिका उभर कर आती है, बल्कि इन गीतों के माध्यम से नारी की भावना, उसका संघर्ष, उसकी आकांक्षाएँ और उसकी सामाजिक स्थिति भी स्पष्ट होती है। असमीया विवाह गीतों में नारी की भूमिका कई रूपों में दिखाई देती है, जिनमें वह एक बेटी, बहन, पत्नी और माँ के रूप में उभर कर सामने आती है। इन गीतों के माध्यम से समाज में नारी की भूमिका को सम्मानित किया जाता है और उसकी भावनाओं को प्रमुखता दी जाती है। विवाह असमीया समाज का एक महत्त्वपूर्ण लोकपर्व माना जाता है, जहाँ असमीया संस्कृति की विशेष झलक देखने को मिलती है। विवाह गीत, जिन्हें ‘बिया नाम’ कहा जाता है, असमीया समाज की सांस्कृतिक और सामाजिक धरोहर का एक अमूल्य रत्न है। असमीया विवाह गीतों में नारी की सशक्त भूमिका को कई स्तरों पर देखा जा सकता है। इन गीतों में नारी को समाज का अभिन्न अंग माना गया है और उसकी भूमिका को केंद्रीय स्थान दिया गया है। नारी न केवल एक परिवार का निर्माण करती है, बल्कि वह समाज की आधारशिला भी होती है। असमीया विवाह गीतों में नारी की भूमिका को सकारात्मक और सशक्त रूप में प्रस्तुत किया गया है, जो उसे समाज में सम्मान दिलाती है।