चित्रा मुद्गल की कहानियां : परिवार विघटन की समस्या
Keywords:
कथा साहित्य, स्त्री साहित्य, पुरुष वर्चस्व, कामकाजी समाज, मध्यवर्ग, बाजारवाद, यौन सम्बन्धAbstract
कथा-साहित्य पुरुष वर्चस्व की मानसिकता को चुनौती देते हुए स्त्री को दोयम दर्जे से मुक्ति का आवाह्न करता है। स्त्री अपने 'स्व' और 'अस्मिता' के रक्षार्थ पुरुष वर्चस्ववादी समाज में निरंतर संघर्ष करती है तथा चातुर्दिक दिशा में फैले शोषण, अत्याचार, अनाचार, अन्याय, नृशंसता आदि का पुरजोर प्रतिरोध करती दृष्टिगोचर होती हैं। वे स्त्री के साथ दलित को, निम्न वर्ग व मध्यवर्गीय परिवार झुग्गी-झोपड़ियों में रहने वाले लोगों तथा किन्नरों की यंत्रणा, पीड़ा, टीस को वाणी प्रदान करने के साथ सामाजिक व्यवस्था के यथार्थ को उजागर करती है। वर्तमान बाजारवादी व्यवस्था में संयुक्त परिवार का पतन हुआ है। आधुनिक काल में मनुष्य के बढ़ते स्वार्थ, ईर्ष्या, अहम और महत्वाकांक्षा के कारण पवित्रता, सम्मान, अपनापन, प्रेम भावना, ममत्व व भावात्मकता की भावना लोगों के भीतर घटने लगी है। परिवार के लोग एक - दूसरे के दुश्मन बन रहे हैं। पिता -पुत्र में तनाव, भाई -बहन के नाजुक रिश्ते टूट रहे हैं। चाचा-भतीजे में दरार पड़ रही है, यौन संबंधों के कारण देवर भाभी के पवित्र रिश्ते बिखर रहे हैं, सास-बहू में दरारें पड़ रही है।