रवींद्रनाथ का लोक चिंतन
Keywords:
लोक साहित्य, शिष्ट साहित्य, बाल साहित्यAbstract
विश्वकवि रवींद्रनाथ ठाकुर साहित्य जगत में एक ऐसा नाम है जिसे लिए बगैर बंगला ही नहीं पूरा भारतीय साहित्य ही पूरा नहीं पड़ता। आधुनिक युग में शायद ही किसी भारतीय भाषा का साहित्य रवींद्रनाथ के प्रभाव से अछूता रह गया हो क्योंकि उनका साहित्य मनुष्य के लिए हमेशा ही जीवन मूल्यों को समर्पित रहने वाला, साहित्य रहा है। इस बेहतर जीवन मूल्य की खोज में रवींद्रनाथ जा पहुंचते हैं ‘लोक’ में। रवींद्रनाथ के ऐसा कहने के पीछे बस यही कारण है कि वे यह देखते हैं कि किस तरह लोक कवियों का यह दल अनेक जगह अनुप्रास भाव, भाषा यहाँ तक कि व्याकरण को भी ठेलकर, फेककर श्रोताओं के सामने प्रगल्भता प्रदर्शन करने में अग्रसर होता है। उसे किसी छन्द के नियम की रक्षा में कोई दिलचस्पी नहीं रहती क्योंकि वह केवल श्रोता के आमोद में मस्त हो जाना चाहता है। वह ऐसी किसी चीज को चाहता ही नहीं जिसमें विचार आवश्यक हो।